उत्तर प्रदेश में चार बार बसपा का परचम लहराकर इतिहास रचने वाली प्रदेश की वर्तमान मुख्यमंत्री मायावती इस बार भी अपना वर्चस्व कायम रखने के लिये हर सियासी दाव पेंच कर रही हैं। मायावती ने पार्टी के चुनाव अभियान को हमेशा अपने हाथ में रखते हुए लंबे अरसे तक यूपी में कबिज रहे कांग्रेस के साथ ही साथ सपा और भाजपा को जड़ से उखाड़ फेंका है। दलितों की मसीहा के रूप में खुद को स्थापित कर मायावती ने इस बार ब्राहम्णों को अपना तुरूप का इक्का बनाया है। ऐसे में अब देखना यह है कि मायावती की यह नई चाल उसे सत्ता में काबिज होने देती है या फिर उन्हें बैकफुट पर ला देती है। यूपी के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है मायावती का परिचय-
मायावती का पुरा नाम मायावती नैना कुमारी है। उनका जन्म 1956 में नई दिल्ली में प्रभु दास और उनकी पत्नी रामरती के यहां हुआ। मायावती के पिता प्रभु भारतीय डाक-तार विभाग से वरिष्ठ लिपिक के रूप में सेवा निवृत्त हुए। उनकी मां हालांकि अनपढ़ थीं, परंतु उन्होंने अपने सभी बच्चों की शिक्षा में रुचि ली और सबको योग्य भी बनाया। मायावती के 6 भाई और 2 बहनें हैं। माया का पैतृक गांव बादलपुर है, जो उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर जिले में स्थित है। मायावती ने दिल्ली के कालिंदी कॉलेज से विधि स्नातक की उपाधि प्राप्त की है।
उनके पास शिक्षा स्नातक की उपाधि भी है और इन्होंने दिल्ली में (इन्द्रपुरी जे जे कॉलोनी) में एक शिक्षक के रूप में भी तब तक कार्य किया, जब तक इन्होंने पूरी तरह राजनीति में आने का निर्णय नहीं ले लिया। एक समय उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षाओं के लिए भी अध्ययन किया था, लेकिन 1977 में कांशीराम से मिलने के बाद इन्होंने एक पूर्ण कालिक राजनीतिज्ञ बनने का निर्णय ले लिया। कांशीराम के संरक्षण के अंतर्गत वह उनकी उस कोर टीम का हिस्सा थीं, जब1984 में उन्होंने बसपा की स्थापना की थी।
राजनीतिक कैरियर
मायावती ने अपना पहला चुनाव उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर के कैराना लोकसभा सीट से लड़ा था। वह अविवाहित हैं और अपने समर्थकों में ‘बहनजी’ के नाम से जानी जाती हैं। मायावती ने चौथी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में लखनऊ के राजभवन में 13 मई 2007 को शपथ ग्रहण की थी। मायावती इससे पहले भी 1995 से लेकर 2003 के बीच तीन बार छोटे कार्यकाल के लिए उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। मायावती पहली दलित महिला हैं, जो भारत के किसी राज्य की मुख्यमंत्री बनीं हैं।
यूपी चुनाव और मायावती
उत्तर प्रदेश चुनाव की बात करें तो मायावती उस तराजू पर बैठी हैं, जिसका पलड़ा कभी ऊपर कभी नीचे हो रहा है। जब-जब लोग लखनऊ और ग्रेटर नोएडा की तरफ देखते हैं, तब-तब यही दिल करता है कि एक बार फिर मायावती को सीएम बना दें, लेकिन जब नजर युवाओं और गरीब किसानों की तरफ जाती है या उन फैक्ट्रियों की तरफ जाती है, जो उनके कार्यकाल में बंद हो गईं, तो मन कचोट सा जाता है। एक तरफ लगता है कि प्रदेश का बंटवारा कर मायावती सभी को विकास की मुख्यधारा से जोड़ सकेंगी, लेकिन दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी द्वारा जारी 100 घोटालों की पुस्तक पढ़कर दिमाग विचलित हो जाता है।
मायावती जब दलित, ब्रह्मण, मुस्लिम और वैश्य समाज की बात करती हैं, तो लगता है कि वो कभी भी जातिवाद की राजनीति से ऊपर नहीं उठ पायेंगी, लेकिन बात जब खुदरा बाजार में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश और परिवारवाद की खिलाफत की आती है तो मन करता है मायावती का ही साथ दें। भ्रष्टाचार की बात करें तो जब मायावती अपने दल से किसी भ्रष्ट नेता को निकला बाहर करती हैं, तो लोग उनकी ओर आकर्षित होते हैं, लेकिन पार्टी की साख दांव पर लगने पर जब वही नेता वापस आ जाते हैं तो लगता है माया सरकार पूरी तरह भ्रष्ट है।
ऐसे ही विचार इस समय यूपी की जनता के मन में घूम रहे हैं। खैर इस समय यह कहना तो काफी मुश्किल होगा कि इन्हें वोट दिया जाये या नहीं, लेकिन सच पूछिए तो रोजगार की दिशा में विकास नहीं देखकर और राज्य में मल्टीनेशनल कंपनियों के नहीं आने पर यहां के युवा का मन खट्टा जरूर है।